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संपादकीय
17 Jun, 2026

हवा में जहर, सांसों पर संकट: बढ़ते प्रदूषण के दुष्परिणाम और बचाव की राह

देशभर में बढ़ता वायु प्रदूषण स्वास्थ्य, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और जीवन की गुणवत्ता पर गहरा प्रभाव डाल रहा है, जिसके समाधान के लिए सरकार और समाज दोनों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

भोपाल, 17 जून।

मध्यप्रदेश को भारत का हृदय कहा जाता है, परन्तु आज यह हृदय प्रदूषण की बीमारी से जूझ रहा है। बात सिर्फ सिंगरौली की नहीं है, जहां गर्भ में पलते 175 शिशुओं की एक वर्ष में मौत हो गई। ग्वालियर, भोपाल, इंदौर, जबलपुर, कटनी और सतना सहित प्रदेश के हर बड़े शहर की हवा जहरीली होती जा रही है। देशभर में हालात और भी भयावह हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 भारत के हैं। प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का आपातकाल बन चुका है।

प्रदूषण के खिलाफ जंग किसी विश्व युद्ध से कम नहीं, क्योंकि इसमें दुश्मन अदृश्य है और हर घर तक पहुंच चुका है। इससे जीतने के लिए बुलेट नहीं, बुलंद इरादों की जरूरत है। यदि आज नहीं चेते तो इतिहास पूछेगा कि जब बच्चों की कोख में सांसें टूट रही थीं, तब हम क्या कर रहे थे।

मध्यप्रदेश में प्रदूषण की समस्या बहुआयामी है। एक ओर सिंगरौली-सोन क्षेत्र थर्मल पावर प्लांट, कोयला खदानों और सीमेंट उद्योगों के कारण गैस चैंबर बन चुका है, तो दूसरी ओर भोपाल और इंदौर जैसे महानगर वाहनों, निर्माण गतिविधियों और बायोमास जलाने से जूझ रहे हैं।

सीपीसीबी के 2026 के आंकड़ों के अनुसार ग्वालियर में PM2.5 का वार्षिक औसत 98 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है, जबकि सुरक्षित सीमा 40 है। भोपाल में नवंबर से जनवरी के बीच वायु गुणवत्ता सूचकांक 300 के पार पहुंच जाता है। दिल्ली-एनसीआर हर सर्दी में स्मॉग की चादर ओढ़ लेता है, पंजाब-हरियाणा में पराली, बिहार-उत्तर प्रदेश में ईंट भट्ठे, महाराष्ट्र-गुजरात में रासायनिक उद्योग और झारखंड-छत्तीसगढ़ में खनन प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।

लैंसेट की रिपोर्ट के अनुसार 2025 में भारत में 16.7 लाख मौतें केवल वायु प्रदूषण के कारण हुईं। यह कोरोना से भी बड़ी महामारी है, परन्तु इस पर उतना शोर नहीं है।

प्रदूषण का असर जन्म से पहले ही शुरू हो जाता है। सिंगरौली में गर्भस्थ शिशुओं की मौतें इसका प्रमाण हैं। PM2.5 के सूक्ष्म कण रक्त के माध्यम से भ्रूण तक पहुंचते हैं, जिससे जन्म के समय कम वजन, ऑटिज्म, अस्थमा और तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों में निमोनिया तथा वयस्कों में सीओपीडी, हृदयाघात, स्ट्रोक और फेफड़ों का कैंसर तेजी से बढ़ रहे हैं।

एम्स के अध्ययन के अनुसार दिल्ली के 30 प्रतिशत स्कूली बच्चों के फेफड़े कमजोर हैं। विश्व बैंक का अनुमान है कि प्रदूषण के कारण भारत की जीडीपी को प्रतिवर्ष 8.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है। यह स्वास्थ्य व्यय, श्रम उत्पादकता में कमी और फसल नुकसान का परिणाम है। ओजोन प्रदूषण से गेहूं और धान की पैदावार भी 10 से 15 प्रतिशत तक घट रही है।

प्रदूषण का असर पारिस्थितिकी तंत्र पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। यमुना और नर्मदा जैसी नदियों में औद्योगिक कचरा जलीय जीवन को समाप्त कर रहा है। मिट्टी में भारी धातुओं की मौजूदगी से सब्जियां विषैली होती जा रही हैं। तापमान वृद्धि और बेमौसम बारिश का चक्र भी प्रदूषण से जुड़ा है। परागण करने वाली मधुमक्खियों की संख्या घट रही है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर संकट गहराता जा रहा है।

प्रदूषण का सबसे बड़ा शिकार गरीब वर्ग बनता है। झुग्गियों में रहने वाले लोग, सड़क पर काम करने वाले मजदूर और ट्रैफिक पुलिसकर्मी एयर प्यूरीफायर नहीं खरीद सकते। अमीर घर बंद करके बच जाता है, लेकिन गरीब की सांसें उखड़ती रहती हैं।

प्रदूषण के बढ़ने के पीछे विकास और पर्यावरण के बीच गलत संतुलन भी जिम्मेदार है। उद्योग स्थापित करते समय पर्यावरणीय नियमों को अक्सर कागजी औपचारिकता बना दिया जाता है। निगरानी तंत्र कमजोर है। देश में केवल 1300 सरकारी मॉनिटरिंग स्टेशन हैं, जबकि आवश्यकता 4000 की है।

सार्वजनिक परिवहन की बदहाली भी एक बड़ा कारण है। भोपाल और इंदौर में मेट्रो परियोजनाएं अभी अधूरी हैं, जिससे लोग निजी वाहनों पर निर्भर हैं। कचरा प्रबंधन की स्थिति भी चिंताजनक है। देश में उत्पन्न 62 मिलियन टन कचरे में से केवल 20 प्रतिशत का ही वैज्ञानिक निपटान होता है, शेष जलकर हवा को जहरीला बनाता है।

प्रदूषण से लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के लक्ष्यों को प्रभावी बनाने के लिए पर्याप्त बजट और जवाबदेही तय करनी होगी। प्रदूषण मानकों का उल्लंघन करने वाले उद्योगों पर कठोर कार्रवाई हो तथा सभी थर्मल पावर प्लांट में एफजीडी सिस्टम अनिवार्य किया जाए।

हर शहर में इलेक्ट्रिक बसें, मेट्रो और साइकिल ट्रैक विकसित किए जाएं तथा निजी वाहनों पर कंजेशन टैक्स लगाया जाए। कृषि अपशिष्ट प्रबंधन के तहत पराली जलाने पर केवल जुर्माना लगाने के बजाय हैप्पी सीडर मशीन पर 90 प्रतिशत सब्सिडी और बायो-सीएनजी उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए। सिंगरौली जैसे क्षेत्रों के लिए जस्ट ट्रांजिशन नीति बनाकर कोयले से सौर ऊर्जा की ओर बदलाव में स्थानीय रोजगार सुनिश्चित किया जाए।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रत्येक जिले में प्रदूषण जनित बीमारियों के लिए अलग ओपीडी स्थापित हो। आशा कार्यकर्ताओं को पल्स ऑक्सीमीटर और एन-95 मास्क उपलब्ध कराए जाएं तथा गर्भवती महिलाओं के रक्त में लेड और मर्करी की मुफ्त जांच हो। उद्योगों के सीएसआर का बड़ा हिस्सा प्रदूषण नियंत्रण तकनीक पर खर्च किया जाए और ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ प्रणाली को अनिवार्य बनाया जाए।

प्रत्येक घर में एक पेड़ लगाने का संकल्प लिया जाए, त्योहारों पर पटाखों के स्थान पर पौधे वितरित किए जाएं, छोटे सफर के लिए साइकिल या पैदल चलने को बढ़ावा मिले तथा कचरे को अलग-अलग कर खुले में जलाने से बचा जाए। वायु गुणवत्ता सूचकांक देखकर अत्यधिक प्रदूषित दिनों में सुबह-शाम व्यायाम से भी परहेज करना चाहिए।

सिंगरौली की कोख में मरे 175 बच्चे हमें झकझोरते हैं, लेकिन यह केवल सिंगरौली की कहानी नहीं है। यह पटना के अस्थमा पीड़ित बच्चे, नागपुर के कैंसर मरीज और दिल्ली के उस बुजुर्ग की भी कहानी है जो ऑक्सीजन सिलेंडर के सहारे जीवन जी रहा है।

यदि विकास की कीमत नागरिकों की सांसें हैं तो ऐसा विकास किसी काम का नहीं। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार देता है और स्वच्छ हवा उसी अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। सरकारों को समझना होगा कि जीडीपी के आंकड़े तब तक बेमानी हैं, जब तक एक्यूआई के आंकड़े बेहतर नहीं होते।

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