नई दिल्ली, 17 जून।
बच्चों में मायोपिया यानी दूर की नजर कमजोर होने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों का लंबे समय तक उपयोग बच्चों की आंखों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है, जिससे कम उम्र में ही चश्मे का नंबर बढ़ने और भविष्य में आंखों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। समय पर पहचान और उपचार नहीं होने पर इसका असर पढ़ाई, खेलकूद और दैनिक गतिविधियों के साथ आंखों की रोशनी पर भी पड़ सकता है।
लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की निदेशक एवं नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सरिता बेरी के अनुसार लगातार मोबाइल इस्तेमाल करने वाले बच्चों में मायोपिया की स्थिति तेजी से बढ़ सकती है। उन्होंने बताया कि प्रभावित बच्चों में आंखों का नंबर हर वर्ष औसतन 0.5 से 1 डायोप्टर तक बढ़ सकता है, जबकि कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी इससे भी अधिक देखी जाती है। कम उम्र में मायोपिया शुरू होने पर भविष्य में चश्मे का नंबर अधिक बढ़ने की संभावना रहती है।
डॉ. बेरी ने कहा कि यदि नियमित रूप से आंखों की जांच नहीं कराई जाती तो बढ़ते नंबर का समय पर पता नहीं चल पाता। अत्यधिक नंबर होने पर आगे चलकर रेटिना डिटैचमेंट, ग्लूकोमा और मोतियाबिंद जैसी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए बच्चों की दृष्टि संबंधी शिकायतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार मायोपिया से प्रभावित बच्चों को दूर की वस्तुएं स्पष्ट दिखाई नहीं देतीं। स्कूल में ब्लैकबोर्ड पढ़ने में परेशानी, बार-बार आंखें मिचमिचाना, सिरदर्द और आंखों में थकान इसके सामान्य लक्षण हैं। ऐसे संकेत दिखाई देने पर अभिभावकों को तुरंत नेत्र परीक्षण कराना चाहिए।
डॉ. सरिता बेरी ने सलाह दी कि बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित रखा जाए और नियमित अंतराल पर आंखों की जांच कराई जाए। उन्होंने कहा कि समय रहते उपचार और निगरानी से मायोपिया की प्रगति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही चश्मे के नंबर में बदलाव होने पर उपचार योजना में आवश्यक संशोधन भी समय पर किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग के दौर में बच्चों की आंखों की देखभाल और नियमित जांच पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। समय पर सतर्कता बरतकर आंखों से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं से बचाव संभव है।















