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संपादकीय
03 Jul, 2026

सिर्फ गर्मी नहीं, तैयारी की कमी भी बन रही है बड़ी आफत

यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने यह दिखा दिया कि बदलती जलवायु के दौर में केवल आधुनिक विकास नहीं, बल्कि मजबूत और समयानुकूल तैयारियां भी उतनी ही जरूरी हैं।

यूरोप, 3 जुलाई।

यूरोप को दुनिया के सबसे विकसित इलाकों में गिना जाता है। वहां की सड़कें, रेल व्यवस्था, अस्पताल और बिजली व्यवस्था आधुनिक मानी जाती हैं। लेकिन पिछले सप्ताह पड़ी भीषण गर्मी ने दिखा दिया कि प्रकृति के सामने केवल विकास काफी नहीं होता। अगर समय के साथ तैयारी नहीं बदली जाए तो सबसे मजबूत व्यवस्था भी कमजोर पड़ सकती है।

इस बार यूरोप में तापमान इतना बढ़ गया कि कई देशों की सामान्य जिंदगी प्रभावित हो गई। फ्रांस, ब्रिटेन और स्पेन में गर्मी ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। तेज धूप और लगातार बढ़ते तापमान के कारण रेल पटरियों के फैलने का खतरा पैदा हो गया, जिससे कई ट्रेनों को रद्द करना पड़ा। कहीं ट्रेनों का वातानुकूलन काम नहीं कर पाया तो कहीं बिजली व्यवस्था पर इतना दबाव बढ़ा कि हजारों घरों की बिजली चली गई।

फ्रांस के कई परमाणु बिजली संयंत्रों को भी अपना उत्पादन कम करना पड़ा। इन संयंत्रों में रिएक्टरों को ठंडा करने के लिए नदी का पानी इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इस बार नदियों का पानी भी इतना गर्म हो गया कि नियमों के अनुसार उसे वापस नदी में छोड़ना पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हो सकता था। इसलिए कई संयंत्रों को धीमी गति से चलाना पड़ा।

गर्मी का सबसे ज्यादा असर लोगों की सेहत पर पड़ा। फ्रांस में दिल का दौरा पड़ने के मामलों में अचानक बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई। स्पेन में भी मौतों की संख्या बढ़ने के संकेत मिले। अस्पतालों पर दबाव बढ़ गया और सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं को हाई अलर्ट पर रखना पड़ा।

सबसे हैरानी की बात यह है कि जिन देशों को आधुनिक जीवन का उदाहरण माना जाता है, वहीं लोग रात में भी चैन की नींद नहीं सो पाए। पुराने मकानों की मोटी दीवारें, जो कभी सर्दी से बचाने के लिए बनाई गई थीं, अब गर्मी को अंदर ही रोक रही हैं। घर रातभर ठंडे नहीं हो पा रहे थे। लोग आधी रात को पार्कों में जाकर बैठने लगे, पोर्टेबल एसी खरीदने की होड़ मच गई और कई परिवारों ने होटल में रात बिताना बेहतर समझा।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होता महाद्वीप बन गया है। वहां हर दस साल में औसतन एक डिग्री फ़ारेनहाइट तापमान बढ़ रहा है। बड़ी समस्या यह है कि वहां की सड़कें, रेलवे लाइनें, सरकारी इमारतें और मकान उस समय बनाए गए थे, जब इतनी भीषण गर्मी की कल्पना भी नहीं की गई थी। इसलिए अब वही ढांचा इस बदलती जलवायु का सामना नहीं कर पा रहा है।

यूरोप के कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि तैयारी की कमी का परिणाम भी है। पिछले कई वर्षों से सरकारें इमारतों को गर्मी के अनुकूल बनाने, सार्वजनिक भवनों में सुधार करने और शहरों को ज्यादा हराभरा बनाने की बातें करती रही हैं। योजनाएं भी बनीं, लेकिन उन पर पर्याप्त पैसा खर्च नहीं किया गया। नतीजा यह हुआ कि कागजों पर तैयारियां दिखती रहीं और जमीन पर समस्याएं बढ़ती चली गईं।

यह घटना भारत के लिए भी बड़ी सीख है। हमारे देश में भी हर साल गर्मी नए रिकॉर्ड बना रही है। कई शहरों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। यदि अभी से शहरों की योजना नहीं बदली गई, पेड़ नहीं लगाए गए, जल स्रोतों की रक्षा नहीं की गई और ऐसी इमारतें नहीं बनाई गईं जो कम गर्म हों, तो आने वाले वर्षों में मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

गर्मी से बचाव का मतलब केवल एयर कंडीशनर लगाना नहीं है। हर व्यक्ति एसी नहीं खरीद सकता और न ही हर जगह बिजली की पर्याप्त व्यवस्था है। असली समाधान यह है कि शहरों में ज्यादा हरियाली हो, इमारतों का निर्माण इस तरह हो कि उनमें गर्मी कम प्रवेश करे, छतों पर गर्मी रोकने वाली तकनीक अपनाई जाए और सार्वजनिक स्थानों पर छाया तथा पीने के पानी की बेहतर व्यवस्था हो। सरकारों को भी हीट एक्शन प्लान केवल कागजों तक सीमित रखने के बजाय उसे पूरी गंभीरता से लागू करना होगा।

यूरोप की यह गर्मी पूरी दुनिया को एक साफ संदेश दे रही है। जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, आज की समस्या है। इससे बचने के लिए केवल पर्यावरण की चिंता करना काफी नहीं, बल्कि अपने शहरों, घरों और बुनियादी सुविधाओं को भी बदलना होगा। जो देश समय रहते तैयारी कर लेंगे, वही आने वाले वर्षों में इस चुनौती का बेहतर सामना कर पाएंगे। बाकी देशों के लिए यह संकट हर साल और बड़ा होता जाएगा।

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