Naidunia Live
• टॉप न्यूज़ • मध्य प्रदेश • विज्ञान व प्रौद्योगिकी • अपराध • शिक्षा • संपादकीय • धर्म / अध्यात्म • वीडियो स्टोरी • मौसम • त्योहार • प्रेरक कहानियाँ
• वीडियो • न्यूज़ आर्काइव

संपादकीय
13 Jul, 2026

अमरनाथ यात्रा: पिघलता हिमलिंग और उखड़ते पेड़, पर्यावरणीय आपदा का संकेत

अमरनाथ यात्रा के दौरान हिम शिवलिंग के तेजी से पिघलने, बढ़ती भीड़ और पर्यावरणीय दबाव को लेकर संरक्षण तथा वैज्ञानिक प्रबंधन की मांग तेज हो गई है।

श्रीनगर, 13 जुलाई।

अमरनाथ यात्रा आस्था का प्रतीक है, लेकिन इस बार आस्था के साथ पर्यावरण की चीख भी सुनाई दे रही है। यात्रा शुरू हुए अभी एक सप्ताह भी नहीं हुआ है और गुफा के भीतर पवित्र हिम शिवलिंग के पिघलने की खबरें सामने आने लगी हैं। साथ ही गुफा के आसपास पेड़ों की कटाई, वन्यजीवों का विस्थापन और कचरे के बढ़ते ढेर ने इस पवित्र क्षेत्र को संकट में डाल दिया है।

3 जुलाई से शुरू हुई 57 दिन की यह यात्रा अब तक लाखों श्रद्धालुओं को गुफा तक पहुंचा चुकी है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी के कारण हिम शिवलिंग के आकार में तेजी से कमी आने की बात कही जा रही है। पर्यावरणविदों और कई धार्मिक संगठनों ने इस पर चिंता जताते हुए मांग की है कि श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड की व्यवस्थाओं की वैज्ञानिक जांच कराई जाए और यात्रा के स्वरूप पर पुनर्विचार किया जाए। समुद्र तल से 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा में बर्फ बनने और पिघलने की प्राकृतिक प्रक्रिया सदियों से चलती आ रही है, लेकिन इस बार स्थिति अलग दिखाई दे रही है।

गर्मी या इंसानी हस्तक्षेप?

श्राइन बोर्ड का कहना है कि इस बार अधिक गर्मी इसका प्रमुख कारण है, जबकि पर्यावरणविद मानते हैं कि केवल मौसम को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उनके अनुसार गुफा के आसपास हजारों लोगों की एक साथ मौजूदगी, सांसों से निकलने वाली ऊष्मा, टॉर्च और मोबाइल से उत्पन्न गर्मी तथा गुफा के भीतर बदलता सूक्ष्म वातावरण भी हिम शिवलिंग के तेजी से पिघलने में भूमिका निभा रहा है। पिछले वर्षों की तुलना में इस बार शुरुआती दिनों में ही शिवलिंग का आकार काफी छोटा होने की बात सामने आई है।

अस्त-व्यस्त पारिस्थितिकी और प्रदूषण

इस वर्ष यात्रा के पहले सप्ताह में ही डेढ़ लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं और अनुमान है कि पूरी यात्रा के दौरान यह संख्या पांच लाख से अधिक हो सकती है। इतनी बड़ी भीड़ के लिए बालटाल और पहलगाम मार्गों पर अस्थायी टेंट, लंगर और शौचालय बनाए गए हैं। इसके लिए जंगलों की कटाई, पहाड़ों को समतल करने और कई स्थानों पर प्राकृतिक ढलानों में हस्तक्षेप किए जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि गुफा के आसपास प्लास्टिक की बोतलें, थर्माकोल और खाद्य सामग्री के पैकेट बिखरे पड़े हैं, जिससे जल स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं।

श्री अमरनाथ बर्फानी लंगर ऑर्गेनाइजेशन तथा कई पर्यावरण संगठनों का कहना है कि बढ़ता प्रदूषण और अनियंत्रित भीड़ हिम शिवलिंग तथा पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर सीधा प्रभाव डाल रही है। उनकी मांग है कि एक स्वतंत्र वैज्ञानिक समिति गठित की जाए, जो गुफा क्षेत्र के भूविज्ञान, जलवायु और पर्यावरण का अध्ययन कर यह निर्धारित करे कि एक दिन में कितने श्रद्धालुओं की उपस्थिति सुरक्षित मानी जा सकती है।

आस्था और प्रकृति का संतुलन

धार्मिक दृष्टि से भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या आस्था के नाम पर प्रकृति को नुकसान पहुंचाना उचित है। अनेक संतों का कहना है कि बाबा बर्फानी स्वयं प्रकृति का स्वरूप हैं और प्रकृति को क्षति पहुंचाकर उनकी आराधना का कोई औचित्य नहीं रह जाता। दूसरी ओर श्राइन बोर्ड का दावा है कि यात्रा के लिए पर्याप्त मेडिकल कैंप, कचरा निस्तारण की व्यवस्था और हर वर्ष वृक्षारोपण जैसे प्रयास किए जाते हैं। हालांकि जमीनी स्थिति इन दावों से अलग दिखाई देती है। यात्रा मार्ग पर कई स्थानों पर कचरे के ढेर हैं, लंगरों से निकलने वाला अपशिष्ट नालों में बह रहा है और शौचालयों की कमी के कारण खुले में गंदगी की शिकायतें भी मिल रही हैं।

पेवर ब्लॉक और कंक्रीट निर्माण ने पहाड़ों की प्राकृतिक जल निकासी को प्रभावित किया है, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। वर्ष 2019 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने भी अमरनाथ यात्रा क्षेत्र को इको-सेंसिटिव जोन के रूप में संरक्षित करने की सिफारिश की थी। तब भी चेतावनी दी गई थी कि अत्यधिक भीड़ इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नुकसानदेह हो सकती है, लेकिन इस दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए। अब हिम शिवलिंग का समय से पहले पिघलना और प्राकृतिक संतुलन का बिगड़ना गंभीर चेतावनी बनकर सामने है।

आगे की राह: संरक्षण ही एकमात्र विकल्प

इस संकट से निपटने के लिए आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। दैनिक यात्रियों की संख्या वैज्ञानिक आधार पर निर्धारित की जाए, कचरा प्रबंधन को पूरी तरह प्रभावी बनाया जाए, प्लास्टिक पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया जाए और केवल जैव अपघटनीय सामग्री के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए। गुफा के पांच किलोमीटर के दायरे में स्थायी निर्माण पर रोक लगे, स्थानीय युवाओं और स्वयंसेवी संगठनों को सफाई तथा निगरानी में शामिल किया जाए और प्रत्येक यात्रा के बाद पर्यावरणीय प्रभाव की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए।

अमरनाथ यात्रा का वास्तविक महत्व प्रकृति के बीच ईश्वर का साक्षात्कार करने में है। यदि वही प्रकृति नष्ट हो जाएगी तो आस्था का आधार भी कमजोर पड़ जाएगा। इसलिए समय की मांग है कि सरकार भीड़ बढ़ाने के बजाय सतत विकास को प्राथमिकता दे, श्राइन बोर्ड पर्यावरण संरक्षण को अपनी नीति का अभिन्न हिस्सा बनाए और श्रद्धालु अनुशासन के साथ प्रकृति का सम्मान करें। अमरनाथ गुफा केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि आज इसे नहीं बचाया गया तो आने वाले वर्षों में न हिम शिवलिंग अपनी प्राकृतिक भव्यता में दिखाई देगा और न ही यह पवित्र क्षेत्र अपनी मूल पहचान बचा पाएगा। आस्था के नाम पर विनाश नहीं, संरक्षण चाहिए; भीड़ के नाम पर व्यवसाय नहीं, मर्यादा चाहिए। क्योंकि जब प्रकृति बचेगी, तभी आस्था भी सुरक्षित रहेगी।

|
आज का राशिफल

मन प्रसन्न बना रहेगा। अचल संपत्ति की खरीद अथवा कृषि उद्यम में रुचि पैदा होगी। परिवार के साथ मनोरांजनिक स्थल की यात्रा होगी। आपसी प्रेम-भाव में बढ़ोतरी होगी। भविष्य की योजनाओं पर विचार विमर्श होगा। अपनों का सहयोग प्राप्त होगा। सभी का सहयोग मिलेगा। शुभांक-1-3-5

आज का मौसम

भोपाल

26° / 33°

Partly sunny

ट्रेंडिंग न्यूज़