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संपादकीय
13 Jul, 2026

20 साल की गारंटी, 3 साल में ध्वस्त: 400 करोड़ की सीसी रोड उखड़ी, ठेकेदार-नौकरशाह का गठबंधन कौन तोड़ेगा?

भोपाल में 20 वर्ष तक टिकने के दावे के साथ बनी 400 करोड़ रुपये की सीसी सड़कें तीन वर्ष में ही क्षतिग्रस्त होने के बाद निर्माण गुणवत्ता, जवाबदेही और ठेकेदारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

भोपाल, 13 जुलाई।

भोपाल की सड़कों पर आज जनता का भरोसा भी उखड़ गया है और सीसी रोड के साथ पेवर ब्लॉक भी उखड़ गए हैं। तीन साल पहले 400 करोड़ रुपये खर्च करके कहा गया था कि ये सड़कें 20 साल तक चलेंगी, लेकिन गारंटी पीरियड पूरा होने से पहले ही कोलार से लेकर सीआई तिराहे तक की सड़कें दरकने लगीं। पेवर ब्लॉक पहली बारिश में ही धंस गए और ठेकेदारों को फिर से भुगतान की फाइल आगे बढ़ने लगी। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? कौन रोकेगा ठेकेदार और नौकरशाहों के इस गठबंधन को, जिसे जनता विकास का नाम देती है और सिस्टम लूट का जरिया बना देता है?

हकीकत बनाम दावे

सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बीते तीन साल में भोपाल में सीसी रोड बनाने पर 400 करोड़ रुपये खर्च किए गए। कोलार रिंग रोड, गिरधर परिसर से सलैया तक 8 करोड़, कलियासोत डैम से न्यू बायपास तक 45 करोड़, रॉयल मार्केट से करोंद तक 21 करोड़ और दर्जनों अन्य सड़कें बनाई गईं। दावा था कि 20 साल तक ये सड़कें नहीं उखड़ेंगी, तकनीक नई है, गुणवत्ता बेहतर है और निगरानी कड़ी है। हकीकत तीन साल में सामने आ गई। सड़कें जगह-जगह टूट गईं, गड्ढे हो गए, पेवर ब्लॉक मिट्टी पर सीधे बिछा दिए गए और पहली बारिश में ही बह गए। इसका मतलब साफ है कि या तो काम घटिया हुआ, या फिर पैसा बीच में ही खा लिया गया, या दोनों हुआ।

लूट का तंत्र: ठेकेदार और अधिकारी का गठबंधन

इस पूरे खेल की जड़ में एक ही गठबंधन है—ठेकेदार और विभागीय अधिकारी का। ठेकेदार को टेंडर चाहिए, अधिकारी को कमीशन चाहिए और जनता को सिर्फ वादे मिलते हैं। काम घटिया होगा तो ठेकेदार को फायदा होगा, क्योंकि लागत कम लगेगी और मुनाफा ज्यादा होगा। अधिकारी आंख बंद कर लेंगे, क्योंकि फाइल पास होते ही लिफाफा पहुंच जाएगा। जब सड़क टूटेगी तो फिर से मरम्मत का टेंडर निकलेगा और फिर वही खेल शुरू होगा। भोपाल में 50 करोड़ रुपये खर्च करके पेवर ब्लॉक लगाए गए, लेकिन तकनीकी जरूरत के अनुसार पहले सीमेंट का बेस नहीं बनाया गया। सीधे मिट्टी पर ब्लॉक बिछा दिए गए। नतीजा पहली बारिश में ही वे धंस गए। अब फिर से मरम्मत के नाम पर करोड़ों की नई फाइल बनेगी और फिर वही ठेकेदार, वही अधिकारी।

जवाबदेही का अभाव और निष्क्रिय जनप्रतिनिधि

स्थानीय विधायक, पार्षद और मंत्री बैठकों में इस मुद्दे को उठाते हैं, फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर डालते हैं और अखबारों में बयान देते हैं कि दोषियों पर कार्रवाई होगी, लेकिन कार्रवाई आज तक नहीं हुई, क्योंकि फाइल उसी टेबल पर अटक जाती है, जहां से उसे पास होना है। जांच कमेटी बनती है, रिपोर्ट आती है और फिर ठंडे बस्ते में चली जाती है। कभी किसी ठेकेदार का लाइसेंस रद्द नहीं हुआ, कभी किसी इंजीनियर पर एफआईआर नहीं हुई। इसलिए हौसले बुलंद हैं और जनता ठगी जा रही है।

सीसी रोड का काम पीडब्ल्यूडी देखता है और पेवर ब्लॉक का काम नगर निगम। दोनों विभाग एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ते हैं। पीडब्ल्यूडी कहता है कि हमने गुणवत्ता से काम कराया था, निगम कहता है कि ठेकेदार ने लापरवाही की। लेकिन जनता पूछती है कि भुगतान किसने किया था, काम का निरीक्षण किसने किया था और गारंटी पीरियड में जिम्मेदारी किसकी है? जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि जवाब होगा तो जिम्मेदारी तय होगी और जिम्मेदारी तय होगी तो कुर्सी हिलेगी।

भ्रष्टाचार की जड़ें और सुधार की दिशा

टेंडर प्रक्रिया में मिलीभगत कर चहेते ठेकेदारों को काम दिया जाता है और शर्तें उनके हिसाब से बनाई जाती हैं। गुणवत्ता जांच का अभाव है। सड़क बनने के बाद थर्ड पार्टी ऑडिट नहीं होता और जो होता भी है, वह कागजी होता है। भुगतान की जल्दी में काम पूरा हुए बिना ही बिल पास कर दिए जाते हैं, ताकि कमीशन समय पर पहुंच जाए। जवाबदेही का अभाव है। कोई अधिकारी निलंबित नहीं होता, कोई ठेकेदार ब्लैकलिस्ट नहीं होता। इसलिए डर खत्म हो गया है।

अगर इस गठबंधन को तोड़ना है तो कठोर और दिखाई देने वाले कदम उठाने होंगे:

  • सभी सड़कों का सोशल ऑडिट हो।

  • थर्ड पार्टी तकनीकी जांच अनिवार्य हो और रिपोर्ट सार्वजनिक वेबसाइट पर डाली जाए।

  • गारंटी पीरियड में सड़क टूटने पर मरम्मत का खर्च ठेकेदार से वसूला जाए और उसे ब्लैकलिस्ट किया जाए।

  • जिस अधिकारी ने काम पास किया है, उसकी जिम्मेदारी तय हो और लापरवाही पर निलंबन के साथ आपराधिक प्रकरण दर्ज हो।

  • टेंडर और भुगतान का डेटा ऑनलाइन पोर्टल पर डाला जाए।

जनता को जगना होगा

सरकार और सिस्टम अपने आप नहीं सुधरेंगे, जब तक जनता सवाल नहीं पूछेगी। जब सड़क बने तो पूछिए कि कितनी मोटी परत है, कितना सीमेंट लगा है और गारंटी कितने साल की है। जब पेवर ब्लॉक लगें तो देखिए कि नीचे बेस बना है या नहीं। सड़क तीन साल में टूट जाए तो चुप मत बैठिए। कलेक्टर कार्यालय में ज्ञापन दीजिए और आरटीआई से जानकारी मांगिए।

400 करोड़ रुपये जनता का पैसा था। वह किसी मंत्री या अधिकारी के बाप का पैसा नहीं था। उस पैसे से 20 साल चलने वाली सड़क बननी थी, लेकिन तीन साल में ही वह उखड़ गई। इसका मतलब है कि किसी ने जनता के भरोसे के साथ धोखा किया है। जब तक ठेकेदार और नौकरशाह का यह गठबंधन नहीं टूटेगा, तब तक हर साल नई सड़क का शिलान्यास होगा और हर मानसून में वही सड़क उखड़ जाएगी। मंत्री चीखते रहेंगे, जनप्रतिनिधि बैठक करते रहेंगे, अखबार खबरें छापते रहेंगे, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदलेगा। अब समय आ गया है कि जिम्मेदारी तय हो, नाम तय हों और जेल की सलाखें भी तय हों। तभी 20 साल की गारंटी का मतलब समझ में आएगा। वरना अगली बार 500 करोड़ की सड़क दो साल में उखड़ेगी और फिर हम सब यही सवाल पूछेंगे कि आखिर जिम्मेदार कौन है?

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