भोपाल, 13 जुलाई।
सरकारी विभागों में आठ साल बाद जब पदोन्नति की सूची जारी हुई, तो कर्मचारियों के चेहरों पर खुशी से ज्यादा सवाल और आक्रोश दिखाई दिया। खुशी इसलिए कि लंबे इंतजार के बाद पदोन्नति का रास्ता खुला, लेकिन आक्रोश इसलिए कि इस प्रक्रिया में विसंगतियां और असंतुलन इतने गहरे हैं कि वरिष्ठता, अनुभव और मेहनत सभी पीछे छूट गए। 1999 में भर्ती हुआ कर्मचारी और 2019 में नियुक्त अधिकारी आज एक साथ पदोन्नत हो रहे हैं। 27 वर्ष की सेवा और पांच वर्ष की सेवा को एक ही तराजू पर तौल देना न न्यायसंगत है और न ही प्रशासनिक दृष्टि से उचित। यह केवल कागजी औपचारिकता पूरी करने जैसा निर्णय प्रतीत होता है, जिसका असर अंततः जनता पर पड़ेगा।
नियमों की अनदेखी और आनन-फानन में निर्णय
पदोन्नति नियम, 2025 के तहत सूची जारी की गई है। नियम के अनुसार हर दस वर्ष में विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक होनी चाहिए, लेकिन समय पर डीपीसी नहीं हुई। अब जब चुनाव नजदीक हैं, तो आनन-फानन में सभी को एक साथ पदोन्नति दे दी गई। इससे सबसे अधिक नुकसान उन कर्मचारियों को हुआ है, जो दो दशक से अधिक समय तक एक ही पद पर कार्य करते रहे। उन्होंने विभाग को संभाला, व्यवस्था चलाई और वर्षों का अनुभव अर्जित किया, लेकिन आज उन्हें वही दर्जा मिल रहा है, जो हाल ही में नियुक्त कर्मचारी को मिला है।
प्रशासनिक दक्षता पर प्रभाव
इसका सबसे बड़ा असर प्रशासनिक दक्षता पर पड़ता है। जब वरिष्ठ और कनिष्ठ के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है, तो जिम्मेदारी का भाव भी कमजोर पड़ जाता है। कनिष्ठ को लगता है कि अनुभव का कोई महत्व नहीं, जबकि वरिष्ठ को प्रतीक्षा का कोई मूल्य नहीं दिखाई देता। परिणामस्वरूप फाइलें लंबित होती हैं, योजनाओं की गति धीमी पड़ती है और जनता को कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। समान पद पर पहुंचने के बाद भी वेतन में अंतर बना रहने से असंतोष और बढ़ गया है। कर्मचारियों का सवाल है कि यदि पद समान है तो वेतन अलग क्यों है? रिक्त पदों की संख्या और पदोन्नति प्रक्रिया में भी पर्याप्त पारदर्शिता नहीं दिखाई दी।
सरकार का पक्ष और प्रशासनिक चूक
सरकार का तर्क है कि पदोन्नति को और अधिक समय तक रोकना उचित नहीं था, इसलिए प्रक्रिया शुरू की गई। लेकिन समय पर पदोन्नति न करना भी उतनी ही बड़ी प्रशासनिक चूक है, जितनी गलत तरीके से पदोन्नति करना। नियमों का पालन समय पर होता तो आज ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
समाधान की राह
समाधान सूची रद्द करना नहीं, बल्कि उसमें आवश्यक संशोधन करना है। वरिष्ठता और अनुभव को उचित महत्व दिया जाए, लंबे समय से पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे कर्मचारियों के लिए विशेष प्रावधान बनाए जाएं और डीपीसी की प्रक्रिया नियमित रूप से हर वर्ष सुनिश्चित की जाए। रिक्त पदों को समयबद्ध तरीके से भरा जाए तथा वेतन विसंगतियों को दूर करने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।
पदोन्नति केवल वेतन बढ़ाने का विषय नहीं, बल्कि सम्मान, विश्वास और कार्य-प्रेरणा से जुड़ा प्रश्न है। यदि कर्मचारियों को न्याय का एहसास होगा, तभी प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावी बनेगी और जनता को बेहतर सेवाएं मिल सकेंगी। अन्यथा अच्छे नियम भी केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगे।














