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संपादकीय
13 Jul, 2026

पीओके जल रहा है, इस्लामाबाद से दमन के आदेश

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बढ़ते विरोध, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर क्षेत्र में तनाव तथा असंतोष लगातार गहराता दिखाई दे रहा है।

मुजफ्फराबाद, 13 जुलाई।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में अब खून की होली खेली जा रही है। रावलकोट में खाद्य आपूर्ति बहाल करने और बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे लोगों पर सुरक्षा बलों ने गोलियां चला दीं। दो लोगों की मौत हुई, 50 से अधिक घायल हुए और इस्लामाबाद ने इसे कानून-व्यवस्था की कार्रवाई बता दिया। यह कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि खुला दमन है। यह उस गुस्से का जवाब है, जो दशकों से वहां के लोगों के भीतर जमा होता रहा है। पीओके के पहाड़ों से निकलने वाली बिजली पूरे पाकिस्तान को रोशन करती है। वहां बड़े-बड़े बांध हैं, जलविद्युत परियोजनाएं हैं और पानी की कोई कमी नहीं है। विडंबना यह है कि जिस जमीन पर बिजली पैदा होती है, उसी जमीन के लोगों को सबसे महंगे बिजली बिल चुकाने पड़ते हैं।

संसाधनों का दोहन और स्थानीय संघर्ष

स्थानीय लोग लंबे समय से सस्ती बिजली की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्हें जवाब में लाठी, जेल और अब गोलियां मिली हैं। इससे बड़ा विरोधाभास और क्या होगा कि संसाधन किसी क्षेत्र के हों और उसका लाभ कहीं और पहुंच जाए। पीओके की लगभग 66 प्रतिशत आबादी खेती और पशुपालन पर निर्भर है, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुपोषण, बेरोजगारी और महंगाई ने हालात और गंभीर बना दिए हैं। पहाड़ी इलाकों में अनेक परिवारों के पास महीने भर का अनाज तक नहीं होता। कारण स्पष्ट है। यहां से अनाज, पानी और खनिज संसाधनों का उपयोग तो होता है, लेकिन आर्थिक लाभ इस्लामाबाद तक सीमित रह जाता है। स्थानीय बाजारों में आटे के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। लोग सब्सिडी की मांग करते हैं तो सरकार बजट का हवाला देती है, लेकिन सुरक्षा बलों और दमन के लिए संसाधनों की कोई कमी दिखाई नहीं देती।

दमनकारी नीतियां बनाम बुनियादी मांगें

जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने सरकार के सामने 38 सूत्रीय मांगपत्र रखा था। मांगें असाधारण नहीं थीं। सस्ती बिजली, आटे पर सब्सिडी, शरणार्थी सीटों की व्यवस्था समाप्त करने और स्थानीय युवाओं को रोजगार देने जैसी बुनियादी मांगें शामिल थीं। सरकार ने संवाद का रास्ता चुनने के बजाय सख्ती का रास्ता अपनाया। विरोध करने वाले लोगों पर कार्रवाई हुई, बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया और नेताओं पर कठोर कानून लगाए गए। अनेक लोगों के लापता होने के भी आरोप लगाए जा रहे हैं। ऐसे माहौल में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की बात बेमानी लगती है।

दोहरा रवैया और बदहाल बुनियादी ढांचा

विडंबना यह भी है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर में मानवाधिकारों की बात करता है, लेकिन अपने कब्जे वाले कश्मीर में लोगों की आवाज दबाने के आरोपों से घिरा रहता है। वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित है, मीडिया पर दबाव की शिकायतें सामने आती रहती हैं और विरोध करने वालों को कठोर कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। यही दोहरा रवैया अब स्थानीय जनता भी समझने लगी है।

क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे की स्थिति भी चिंताजनक बताई जाती है। अनेक स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, अस्पतालों में पर्याप्त दवाएं उपलब्ध नहीं हैं और सड़कों की हालत खराब है। कई बार इंटरनेट सेवाएं भी बाधित कर दी जाती हैं। ऐसे माहौल में युवाओं के भीतर असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। अब अनेक युवा खुलकर कह रहे हैं कि उनके संसाधनों का दोहन किया जा रहा है, जबकि बदले में उन्हें विकास और सम्मान नहीं मिल रहा। यही असंतोष अब सड़कों पर विरोध के रूप में दिखाई दे रहा है।

चुनाव और भविष्य की चुनौतियां

27 जुलाई को प्रस्तावित चुनावों की तैयारियां चल रही हैं और नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हालांकि विरोधी पक्ष का आरोप है कि मौजूदा माहौल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। उनका कहना है कि भय और दबाव के वातावरण में लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपना वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं कर सकती। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने सरकार को 14 जुलाई तक का समय दिया है और चेतावनी दी है कि मांगें पूरी नहीं होने पर 15 जुलाई से मुजफ्फराबाद मार्च फिर शुरू किया जाएगा।

यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि लोगों के बुनियादी अधिकारों और सम्मान का भी विषय है। पीओके की जनता दया नहीं, अपने अधिकार मांग रही है। वह उस बिजली पर अपना हक चाहती है, जो उसके पहाड़ों से पैदा होती है। वह उस अनाज पर अधिकार चाहती है, जो उसकी जमीन से निकलता है, और वह सम्मान चाहती है, जो हर नागरिक का अधिकार है। यदि समय रहते संवाद और समाधान का रास्ता नहीं अपनाया गया, तो असंतोष और गहरा हो सकता है। इतिहास हमेशा यही याद रखता है कि किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत अपने नागरिकों का विश्वास होता है, न कि उनके खिलाफ इस्तेमाल की गई ताकत।

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